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चौंकाने वाले आँकड़े-40% भारतीय वयस्क कृमियों(Worms) से पीड़ित- सरकार इन उपायों से कर रही रोकथाम (National Deworming Day 2024)

कृमि संक्रमण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, विशेष रूप से बच्चों में। कृमि संक्रमण से बच्चों का समग्र विकास प्रभावित होता है। इसलिए, भारत सरकार द्वारा 2015 से हर साल 10 फरवरी को राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस(National Deworming Day) मनाया जा रहा है।

इस दिन का मुख्य उद्देश्य 1 से 19 आयु वर्ग के बच्चों को कृमि निवारण की एक खुराक देकर कृमि संक्रमण से बचाना है। स्कूलों में बच्चों को एल्बेंडाजोल की गोली दी जाती है जो कृमियों को मारती है।

कृमि संक्रमण से बच्चों की पोषण स्थिति खराब होती है। इससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है। कृमि खून को चूस कर एनीमिया और कुपोषण का कारण बनते हैं।

अतः माता-पिता का यह दायित्व है कि वे अपने बच्चों को नियमित रूप से कृमि निवारक दवाएं दें। स्कूल प्रशासन भी इस दिन बच्चों को दवाएं बांटे।

सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं को जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को कृमि संक्रमण के खतरे और रोकथाम के बारे में शिक्षित करना चाहिए। राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस पिछले वर्षों के आंकड़ों सहित:

कृमि संक्रमण भारत जैसे विकासशील देशों में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में 60 करोड़ से अधिक बच्चे कृमि संक्रमण से प्रभावित हैं। ये कृमि संक्रमण बच्चों के समग्र शारीरिक और मानसिक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।

इन समस्याओं से निपटने के लिए 2015 से हर साल 10 फरवरी को राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस मनाया जा रहा है। इस दिन 1 से 19 आयु वर्ग के सभी बच्चों को स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों में नि:शुल्क कृमि निवारक दवाएं दी जाती हैं।

 आइए हम पिछले कुछ वर्षों के आकड़ों पर एक नज़र डालें:

  • साल 2019 में लगभग 22 करोड़ बच्चों को कृमि निवारक दवाएं दी गईं।
  • 2020 में कोविड-19 की वजह से राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस नहीं मनाया जा सका।
  • 2021 में लगभग 13 करोड़ बच्चों को कवर किया गया।
  • 2022 में अब तक की सबसे अधिक संख्या में9 करोड़ से अधिक बच्चों को दवाएं दी गईं।

ये आंकड़े बताते हैं कि जागरूकता अभियानों का सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है और लोग अपने बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे हैं। लेकिन फिर भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अनभिज्ञ हैं और अपने बच्चों को दवाएं नहीं दिलवाते।

सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं को ऐसे क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाने चाहिए ताकि किसी भी बच्चे को कृमियों का शिकार न बनना पड़े। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका भी इन दूर-दराज के क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

आशा की जाती है कि निरंतर प्रयासों से जल्द ही भारत बच्चों के कृमि संक्रमण से मुक्त हो जाएगा। राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस इस लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

भारत में कृमि निवारण कार्यक्रम पर काम करने वाली एजेंसियों और मंत्रालयों के नाम और योगदान:

  1. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (The Ministry of Health and Family Welfare):

  • राष्ट्रीय कृमि निवारण कार्यक्रम शुरू किया
  • कृमि निवारण नीति और दिशानिर्देश तैयार किए
  1. विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization (WHO):

  • तकनीकी सहायता प्रदान की
  • क्षमता निर्माण में मदद की
  1. यूनिसेफ (UNICEF):

  • राज्य सरकारों के साथ काम कर जागरूकता बढ़ाई
  • कृमि निवारण गतिविधियों को बढ़ावा दिया
  1. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (Bill & Melinda Gates Foundation):

  • कार्यक्रम को वित्तीय सहायता प्रदान की
  • नवाचार और शोध को बढ़ावा दिया
  1. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research (ICMR):

  • नैदानिक ​​परीक्षण और अनुसंधान
  • नई दवाओं की खोज

इन सभी संस्थाओं के प्रयासों से कृमि निवारण कार्यक्रम को मजबूती मिली है।

राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस का महत्व:

  1. यह बच्चों में कृमि संक्रमण के प्रति जागरूकता फैलाता है।
  2. यह नि:शुल्क कृमिनाशक दवाओं के वितरण के माध्यम से बच्चों का इलाज करता है।
  3. यह कृमि संक्रमण से होने वाली पोषण संबंधी कमियों और एनीमिया जैसी समस्याओं से बचाता है।
  4. यह बच्चों के समग्र शारीरिक व मानसिक विकास को बेहतर बनाने में मदद करता है।
  5. यह सरकार, अस्पतालों, स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों के बीच एकीकृत कार्यनीति को बढ़ावा देता है।

इस प्रकार, राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस देश में कृमि संक्रमण को कम करने और बच्चों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

शरीर में कृमि संक्रमण कई प्रकार के जीवाणुओं से होता है:

  1. राउंडवर्म (Round worm) – इन्हें अस्केरिस लंब्रीकॉइड्स कहते हैं। ये आंतों में रहते हैं और पेट दर्द, दस्त और कुपोषण का कारण बनते हैं।
  2. हुकवर्म (Hook Worm)- इन्हें एन्साइलोस्टोमा ड्यूओडेनेल कहा जाता है। ये आमाशय और आंतों में पाए जाते हैं और भूख न लगना, पेट फूलना और मतली जैसी समस्याएं पैदा करते हैं।
  3. थ्रेडवर्म (Thread Worm) – इन्हें स्ट्रॉन्जाइड्स स्टरकोरालिस कहा जाता है। ये आंतों में रहते हैं और डायरिया, पेट दर्द और एनीमिया पैदा कर सकते हैं।
  4. विप्पवर्म (Dwarf Tapeworm) – इन्हें हाइमिनोलेपिस नेना कहते हैं। ये कीड़े मल और मूत्र मार्गों में पनपते हैं, और कब्ज, पेट दर्द का कारण बनते हैं।

इन कारण जीवाणुओं से बच्चों और वयस्कों दोनों में कृमि संक्रमण हो सकता है। इनसे बचाव के लिए स्वच्छता और कृमिनाशक दवाएं लेना ज़रूरी है।

कृमि संक्रमण (Worm Infection) के जोखिम को कम करने के लिए बढ़ावा दिए जाने वाले अभ्यास (Practices to reduce worm Infection):

  1. हाथों की स्वच्छता बनाए रखना: खाना खाने से पहले और शौच के बाद हमेशा हाथ अच्छी तरह से धोना चाहिए। यह कृमि संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद करता है।
  2. कीटाणुरहित पेयजल का सेवन करना: केवल उबाले, फ़िल्टर या क्लोरीनयुक्त पानी का ही प्रयोग करना चाहिए। गंदे पानी से संक्रमण फैल सकता है।
  3. खाद्य सुरक्षा बनाए रखना: फल, सब्जियों और अन्य खाद्य पदार्थों को अच्छी तरह धोकर या पकाकर ही खाना चाहिए।
  4. शौचालय का उपयोग करना: खुले में शौच न करें, हमेशा शौचालय का उपयोग करें। यह संक्रमण को फैलने से रोकता है।
  5. जूते पहनना: बिना जूतों के बाहर न घूमें। जूते पहनने से कीटाणुओं से संक्रमण होने का खतरा कम होता है।

वयस्कों में कृमि संक्रमण के प्रभाव:

  1. पाचन संबंधी समस्याएं – कृमि संक्रमण के कारण वयस्कों में पेट दर्द, गैस, दस्त, अपच और कब्ज जैसी पाचन सम्बन्धी समस्याएं हो सकती हैं।
  2. कुपोषण और एनीमिया – कृमि पोषक तत्वों को अवशोषित कर लेते हैं जिससे शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इससे कुपोषण और एनीमिया जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
  3. थकान और कमजोरी – कृमि संक्रमण वयस्कों में थकान, कमजोरी और उर्जा की कमी भी उत्पन्न कर सकता है।
  4. रोगप्रतिरोधक क्षमता में कमी – कृमि संक्रमण शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करता है जिससे संक्रमण की सम्भावना बढ़ जाती है।
  5. त्वचा समस्याएं – कुछ प्रकार के कृमि संक्रमण चेहरे, हाथों और पैरों में खुजली व दाने उत्पन्न कर सकते हैं।

इसलिए कृमि संक्रमण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और समय पर इलाज जरूरी है।

कृमि संक्रमण का उपचार (एलोपैथी, आयुर्वेद और होम्योपैथी) में:

  1. एलोपैथी में कृमि संक्रमण के उपचार के लिए मेबेंडाज़ोल, अल्बेंडाज़ोल, पाइरैंटेल पामोएट जैसी दवाएँ दी जाती हैं। ये कृमियों को मारकर शरीर से बाहर निकालती हैं।
  2. आयुर्वेद में कृमि संक्रमण के लिए विडंगा, पुनर्नवा, अजमोदा जैसी जड़ी-बूटियों से बनी दवाएँ दी जाती हैं। ये कृमियों को मारने के साथ ही पाचन तंत्र को भी मजबूत करती हैं।
  3. होम्योपैथी में कैंथरिड, चिना सल्फ और टेपीआ जैसी दवाएँ दी जाती हैं। ये लक्षणों को कम करते हुए रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर कृमियों को मारती हैं।

इन तीनों पद्धतियों से कृमि संक्रमण का प्रभावी उपचार संभव है।

समापन विचार (Conclusion)

 राष्ट्रीय कृमि निवारण दिवस के माध्यम से पिछले कुछ वर्षों में करोड़ों बच्चों तक पहुंचने में सफलता मिली है। 2019 में 22 करोड़ से अधिक बच्चों को कवर किया गया। 2021 और 2022 में भी क्रमशः 13 करोड़ और 17.9 करोड़ बच्चों तक पहुंचा गया। यह एक सकारात्मक प्रगति है।

हालांकि, केवल बच्चों तक सीमित रहने की बजाय वयस्कों को भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, क्योंकि वयस्क भी कृमि संक्रमण के प्रति उतने ही संवेदनशील होते हैं।

कुछ अध्ययनों के अनुसार, भारत में 40% वयस्क आबादी कृमि संक्रमण से ग्रस्त है। गर्भवती महिलाओं में यह संक्रमण गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है। वयस्कों के स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता है।

अतः सरकार को चाहिए कि वह राष्ट्रीय कृमि निवारण कार्यक्रम का दायरा बढ़ाए, और वयस्कों, विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं को भी इसमें शामिल करे। तभी हम देश में कृमि संक्रमण की समस्या पर पूर्ण विजय प्राप्त कर सकेंगे।

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